मन भर कर इठला भी ना पाई 

बारिश और वाे भी घनी रात में, एक अलग ही रंग हाेता है तब! पर क्या करते! बातें बहुत थी करने काे, कम्बख्त आखिर माैके पर उसका माेबाइल बैलेंस लाे हाे गया और मेरा माेबाइल बैटरी बैकअप फ्लाप हाे गया !

बीच में ही विराम लगाना पड़ा. 

बाताें का पिटारा बंद करना पड़ा यूं अचानक. 

मन भर कर इठला भी ना पाई फाेन रखने से पहले!

आधे पेट साेये हम दाेंनाे ❤

Advertisements

दो किस्से

किस्सा – १  :

पिछले हफ्ते  लैब में कलीग की सगाई हुई, तो लोग उन्हें बधाई देने के साथ- साथ उत्सुकतावश यह भी पूछते नज़र आये  की – ‘लड़की कैसी है दिखने में ?! 

किस्सा – २  :

और आज सुबह कॉलोनी में ही रहने वाली एक दीदी की शादी जमने की खबर फैलने पर लोग ये जाने को लालायित थे की ‘लड़का करता क्या है?!’

ये वही प्रश्न है जो मैं स्कूल से – बड़ों के मूँह से सुनती आ रही हूँ ! और समय के साथ – स्कूल – कॉलेज के पाठ्यक्रम बदल गए पर ये प्रश्न आज भी वैसे के वैसे ही हैं।

इन बांसे हो चुके प्रश्नों से भेदभाव / ‘एक ही दृष्टिकोण’ की बू अभी तक गयी नहीं !

अरसों बाद

अरसों बाद किसी की आवाज़  ने  मेरे कानों में खनक पैदा की; दिल में गुदगुदी हुई; जड़ हो चुके मस्तिष्क पर नमी सी महसूस हुई है; लगा जैसे बरसों से पड़ी बंद खिड़की पर बारिश की बूंदों ने एक साथ खटखटाहट कर दी.. 

बच्चों की किलकारियां ऐसी ही होती हैं , जब भी पड़ती हैं अंतर्मन को पिघला देती हैं।